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Monday, 7 October 2013

Birth of A Poetry


When the world is full of words
strewn beautifully together 
to form a rainbow
on the sky of your mind's vision

When the sky is full of colours
splashed meaningfully 
to form an image
on the canvas of your thoughts 

When the ground is covered 
with imagery
of your unfolded dreams
on the bed of scrutiny

Poetry emerges
from the depth of the ocean
as a shiny pearl 
of wisdom and grace.

~07/10/2013~

Monday, 30 September 2013

Canvas and colours



From the depths of my waking dreams
I pluck the various blooming flowers
Only to crush them for my brush
To paint the canvas of my life

From the vast abandoned main lands
I scrape the mud and rocks
To pelt them on my thoughts
Of soaring altitude

From the Zenith of my ingenuity
I bring colours and scheme
To spawn the images
Of my dexterity .

~~30/09/2013~~



Tuesday, 24 September 2013

अफसाना


सीली  सीली सी भोर
पक्षियों का मधुर शोर
जाती शीत लहर
लाये शुष्क नमी सी
मन को भिगोये
हलकी फुहार ठंडी सी
हरी कोमल कोपल
झाँक झाँक मुस्काए
भूरे बेजान पत्ते
हवा संग इतराएँ
नन्हे क़दमों की किलकारी

गूंज गूंज जाए!!

~~२४/०९/२०१३~~

Friday, 23 August 2013

राखी



एक बार फिर आ गया
भाई बहन के अटूट बंधन का त्यौहार..

सजेंगी कलाइयां भाइयों की
बहन के प्रेम धागे से
नम होंगी फिर आँखें
सर पे टीका सजाते
मुंह में बर्फी खिलाते ..

जब करें आरती भाई भावज की
दिल गदगद हो जावे
उनकी खुशियों की कामना
मन में सजाये
दिल बलैयां भरपूर लेवे ..

पिता के वंश को आगे बढ़ाते
उन नन्हे कोमल फूलों
की किलकारी में 
मिश्री
घुलती सी जावे  !!

राखी के इस पावन पर्व पे
शुभकामनायें और प्रेम
स्वीकार करो मेरा भी
पुलकित हो तब मन  
हर्षोउल्लास से भर जावे !!!


~१९/०८/२०१३~

Tuesday, 6 August 2013

किरण

वीरान घास के मैदान में
सूखे पत्तों पे पड़ते कुछ
सुस्त कदमों की चरमराहट

शुष्क हवाओं में
विलीन होते रेत के बवंडर से
चिपकी रूह की सरसराहट

अनसुने शब्दों के महल को
ताश के पत्तों सा
बिखरते देखने की घबराहट

ऊपर बहुत ऊपर
उस सूखे पेड़ की डाल पे
बंजर घोंसले से सुनी आहट

आह!  जिंदगी
देख तुम्हें भर आई आँखें
नयी किरण अब आई सिमट !!


~०६/०८/२०१३ ~

Friday, 12 July 2013

नयी उम्मीद


जख्मी हुए थे कई ह्रदय
भर गए अब घाव सारे
क्यों रिसता है खून
बहती है मवाद की धारा ?
रिश्तों की मरहम से
पट गए सबके मन
आंसू सिर्फ एक जीवन में
आज भी वो हृदय
चीखता है बिलखता है
कहाँ फर्क पड़ता है जहाँ में?

हे सूरज! ये कैसा न्याय है
सबको मिलती रौशनी एक सी
फिर भी क्यों दिखता अँधेरा सा

उठो ना .. पोंछ लो आँसू
महसूस कर के तो देखो
सूर्य अन्यायी नहीं
काला चश्मा पहना हमने ही
हटा पाएंगे जिस दिन ये पर्दा
खिलखिलाती धुप से नहा ही लेंगे !


~१२/०७/२०१३~