Can full of words spills frothing from it splashing on the blank paper weaving meaningful images.
Tuesday, 24 September 2013
Friday, 23 August 2013
राखी
एक बार फिर आ गया
भाई बहन के अटूट बंधन का त्यौहार..
सजेंगी कलाइयां भाइयों की
बहन के प्रेम धागे से
नम होंगी फिर आँखें
सर पे टीका सजाते
मुंह में बर्फी खिलाते ..
जब करें आरती भाई भावज की
दिल गदगद हो जावे
उनकी खुशियों की कामना
मन में सजाये
दिल बलैयां भरपूर लेवे ..
पिता के वंश को आगे बढ़ाते
उन नन्हे कोमल फूलों
की किलकारी में
मिश्री
घुलती सी जावे !!
राखी के इस पावन पर्व पे
शुभकामनायें और प्रेम
स्वीकार करो मेरा भी
पुलकित हो तब मन
हर्षोउल्लास से भर जावे !!!
~१९/०८/२०१३~
Tuesday, 6 August 2013
किरण
वीरान घास के मैदान में
सूखे पत्तों पे पड़ते कुछ
सुस्त कदमों की चरमराहट
शुष्क हवाओं में
विलीन होते रेत के बवंडर से
चिपकी रूह की सरसराहट
अनसुने शब्दों के महल को
ताश के पत्तों सा
बिखरते देखने की घबराहट
ऊपर बहुत ऊपर
उस सूखे पेड़ की डाल पे
बंजर घोंसले से सुनी आहट
आह! जिंदगी
देख तुम्हें भर आई आँखें
नयी किरण अब आई सिमट !!
~०६/०८/२०१३ ~
Friday, 12 July 2013
नयी उम्मीद
जख्मी हुए थे कई ह्रदय
भर गए अब घाव सारे
क्यों रिसता है खून
बहती है मवाद की धारा ?
रिश्तों की मरहम से
पट गए सबके मन
आंसू सिर्फ एक जीवन में
आज भी वो हृदय
चीखता है बिलखता है
कहाँ फर्क पड़ता है जहाँ में?
हे सूरज! ये कैसा न्याय है
सबको मिलती रौशनी एक सी
फिर भी क्यों दिखता अँधेरा सा
उठो ना .. पोंछ लो आँसू
महसूस कर के तो देखो
सूर्य अन्यायी नहीं
काला चश्मा पहना हमने ही
हटा पाएंगे जिस दिन ये पर्दा
खिलखिलाती धुप से नहा ही लेंगे !
~१२/०७/२०१३~
Thursday, 6 June 2013
Wednesday, 29 May 2013
बारिश
वाह! क्या खूब है ये
बारिश
कभी हँसाती कभी
रुलाती
दिल में अनजान चेहरा
सी
खुशबु उड़ाती मन को
बहलाती
ये बारिश..
ममतामई आँखों में डबडबाती सी
जवान पलकों पे मुस्काती सी
अनजान ख्यालों से सेहराती
एक अहसास सी
ये बारिश..
चंचल क़दमों में फुदकती
उन्मुक्त बेखयाली हंसी सी
प्रफुलित करती तन मन
फिर, दिल को गुदगुदाती
ये बारिश..
इन्द्रधनुषी सपने सजाती
फूल-पत्ती, खेत-खलयान में
मोती सी चमकती
सोई धरती को जगाती
ये बारिश..
यही तो है, जिंदगी,
जीने की चाह बढाती
मासूम अधरों पे खिलखिलाती
हर मन बस-बस जाती
ये बारिश..!!!
~29/05/2013~
Monday, 6 May 2013
राह
तप रही है मरुभूमि
अगन लगी है हर ओर
ऐ रंगरेज तू ही बता
इस का सरल हल कोई..
युद्ध है यहाँ और वहाँ भी
कमज़ोर है हर इंसान
फिर भी समझे बलवान
हर दुसरे से..
प्यासा हूँ एक बूँद पानी का
खून से रंगी हर नदी है
अरे नहीं !! वो सामने तो
मिठास बह रही है ..
ये किसका अक्स है पानी में
ये में तो नहीं हूँ
ये लाल छींटे मुख पे मेरे भी
हाथ जख्मी , जलते हैं..
में तो बच कर रहा कितना
खुनी हुआ फिर मेरा क्यों दामन
क्या सच का अर्थ बदल गया
भूल गया में भी क्या.. सच??
ऐ रंगरेज.. तू ही बता
कैसे करूँ साफ़ ये दामन
बदरंग चेहरे पे फिर
ला सकूँ इन्द्रधनुष ??
~~06/05/2013~~
Subscribe to:
Posts (Atom)



